Operation Sindoor के एक साल बाद भी नहीं बदले हालात! टूटी छतों और डर के साए में जी रहे लोग

Edited By Sunita sarangal, Updated: 08 May, 2026 10:59 AM

kashmir situation after one year of operation sindoor

ग्रामीणों के अनुसार सरकार की ओर से घरों के पुनर्निर्माण के लिए 2 से 3 लाख रुपये की सहायता दी गई, लेकिन पहाड़ी सीमा क्षेत्र में निर्माण कार्य की बढ़ती लागत और परिवहन संबंधी कठिनाइयों के कारण यह राशि पर्याप्त नहीं है।

बारामूला(रिजवान मीर): ऑपरेशन सिंदूर के एक वर्ष बाद भी उत्तर कश्मीर के उड़ी सेक्टर के सलामाबाद गांव के निवासी सीमा पार गोलाबारी से क्षतिग्रस्त हुए अपने घरों के पुनर्निर्माण के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कई परिवारों का कहना है कि सरकार द्वारा दी गई सहायता उनकी जरूरतों के मुकाबले बेहद कम साबित हुई है। एल.ओ.सी. के नजदीक बारामूला जिले के सलामाबाद गांव के लोगों ने ऑपरेशन की बरसी पर बताया कि बीते वर्ष की हिंसा के बाद उनका जीवन अब भी सामान्य नहीं हो पाया है। आर्थिक तंगी, अपर्याप्त बुनियादी सुविधाएं और लगातार बना डर उनके लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।

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ग्रामीणों के अनुसार सरकार की ओर से घरों के पुनर्निर्माण के लिए 2 से 3 लाख रुपये की सहायता दी गई, लेकिन पहाड़ी सीमा क्षेत्र में निर्माण कार्य की बढ़ती लागत और परिवहन संबंधी कठिनाइयों के कारण यह राशि पर्याप्त नहीं है। गांव निवासी तालिब हुसैन ने कहा, “हम दिहाड़ी मजदूर हैं और दिनभर में केवल 500 रुपये कमाते हैं। घर का राशन और दवाइयां जुटाना ही मुश्किल है, ऐसे में इतनी कम राशि से घर कैसे बनाएं?”

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कई परिवार आज भी अस्थायी आश्रयों या आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त मकानों में रहने को मजबूर हैं। ग्रामीणों ने बताया कि संवेदनशील सीमा क्षेत्र होने के बावजूद गांव में सुरक्षा बंकरों की व्यवस्था नहीं की गई है। सड़क संपर्क की कमी ने लोगों की परेशानियों को और बढ़ा दिया है। ग्रामीणों को निर्माण सामग्री लंबी दूरी तक सिर पर उठाकर ले जानी पड़ रही है, जिससे पुनर्निर्माण की लागत और मुश्किलें दोनों बढ़ गई हैं।गांव की महिलाओं ने मानसिक तनाव और उपेक्षा की भावना भी व्यक्त की। जीनत नामक महिला ने कहा कि उन्हें केवल एक बार राहत मिली और उसके बाद किसी अधिकारी ने दोबारा उनकी सुध नहीं ली। उन्होंने कहा, “सबको हमारी हालत का पता था, लेकिन फिर कोई हमारे पास नहीं आया।”

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ग्रामीणों का कहना है कि अब तक किसी प्रकार की बैंक ऋण सुविधा या अतिरिक्त पुनर्वास योजना उन तक नहीं पहुंची है। अधिकांश परिवार दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर हैं, जिससे घर निर्माण के लिए पैसे बचा पाना बेहद कठिन हो गया है। तालिब हुसैन ने बताया कि उनके परिवार को बच्चों की शिक्षा जारी रखने में भी भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा, “हम दिन-रात मेहनत सिर्फ बच्चों का पेट भरने के लिए करते हैं। मेरा बड़ा बेटा कॉलेज में पढ़ता है, लेकिन उसकी पढ़ाई का खर्च उठाना मुश्किल हो गया है।”

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एक अन्य निवासी सामिया ने बताया कि उनका घर पूरी तरह तबाह हो चुका है और परिवार आज भी भय और असुरक्षा के माहौल में जी रहा है। उन्होंने कहा, “हमने बहुत कुछ झेला है। हमारा घर खत्म हो गया। आज भी कोई तेज आवाज सुनते हैं तो डर जाते हैं। एक साल बीत गया, लेकिन हमारी परेशानियां खत्म नहीं हुईं। हम चाहते हैं कि सरकार हमें रहने के लिए एक सुरक्षित घर दे।” ग्रामीणों ने प्रशासन से मुआवजा बढ़ाने, सड़क संपर्क बेहतर करने, सुरक्षा बंकर उपलब्ध कराने और अतिरिक्त पुनर्वास सहायता देने की मांग की है ताकि वे सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन जी सकें।

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