Edited By Neetu Bala, Updated: 11 Feb, 2026 06:48 PM
जम्मू : दुनिया भर में ऑनलाइन वीडियो गेम खेलने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। वर्ष 2020 में लगभग 2.7 अरब लोग गेम खेल रहे थे और यह संख्या लगातार बढ़ रही है। हालांकि सीमित समय तक गेम खेलना मनोरंजन का साधन हो सकता है, लेकिन अत्यधिक गेमिंग शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और शैक्षणिक जीवन पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है। मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. जगदीश थापा के अनुसार लगभग 2 से 3 प्रतिशत गेमर्स में क्लिनिकल गेमिंग डिसऑर्डर विकसित हो सकता है।
मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव
गेमिंग लत से मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर देखा गया है। अत्यधिक गेम खेलने से भावनात्मक नियंत्रण कमजोर हो सकता है, जिससे चिंता, अवसाद, आक्रामकता और सामाजिक घबराहट जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। डाक्टर के अनुसार रोजाना 2 घंटे से अधिक समय तक गेम खेलने वाले लोगों में अवसाद के लक्षण बढ़ने का खतरा अधिक होता है।
हिंसक गेम्स का लंबे समय तक संपर्क व्यक्ति के व्यवहार और भावनात्मक प्रतिक्रिया को भी प्रभावित कर सकता है। शारीरिक स्वास्थ्य पर भी इसके दुष्प्रभाव स्पष्ट हैं। कई गेमर्स देर रात तक खेलते हैं, जिससे नींद पूरी नहीं हो पाती और अनिद्रा की समस्या पैदा होती है।
पर्याप्त नींद न लेने से याददाश्त कमजोर होती है और दैनिक कार्यों में ध्यान केन्द्रित करना कठिन हो जाता है। लंबे समय तक एक ही स्थान पर बैठने से मोटापा, मांसपेशियों में कमजोरी, पीठ और गर्दन दर्द, आंखों में जलन तथा सिरदर्द जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। कुछ मामलों में हृदय संबंधी समस्याओं का खतरा भी बढ़ जाता है।
आत्महत्या के जोखिम कारक
हाल ही में चर्चा में आए तथाकथित कोरियन लव गेम को लेकर कई तरह की खबरें और दावे सामने आ रहे हैं। कुछ रिपोर्टों में कहा गया कि इस ऑनलाइन गेम के प्रभाव में आकर तीन बच्चों ने अपनी जान गंवा दी। विशेषज्ञों के अनुसार, कोई भी ऑनलाइन गेम सीधे तौर पर किसी को आत्महत्या के लिए मजबूर नहीं करता।
लेकिन यदि किसी गेम में खतरनाक चैलेंज, भावनात्मक हेरफेर, डराने-धमकाने वाले टास्क या आत्म-हानि से जुड़े निर्देश शामिल हों, तो मानसिक रूप से कमजोर या संवेदनशील बच्चों पर उसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। खासकर वे बच्चे जो पहले से अवसाद, अकेलेपन, बुलिंग या पारिवारिक तनाव का सामना कर रहे हों, वे ऐसे ऑनलाइन ट्रैंड्स के प्रभाव में जल्दी आ सकते हैं।
डाक्टर की राय
मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. जगदीश थापा ने बताया कि डॉ. बच्चों के मोबाइल और ऑनलाइन गतिविधियों पर संतुलित निगरानी रखें। उनसे खुलकर बातचीत करें और डर का माहौल न बनाएं। यदि बच्चे के व्यवहार में अचानक बदलाव, चिड़चिड़ापन, अलगाव या अवसाद के संकेत दिखें, तो तुरंत विशेषज्ञ से सलाह लें।
बच्चों को सिखाएं कि कोई भी ऑनलाइन चैलेंज या गेम उनकी जान से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है। आखिरकार, समस्या सिर्फ किसी एक गेम की नहीं, बल्कि डिजिटल जागरूकता और मानसिक स्वास्थ्य की है। सही मार्गदर्शन, संवाद और सतर्कता से ऐसे हादसों को रोका जा सकता है।
स्क्रीन टाइम सीमित करना, गेम की सामग्री पर निगरानी रखना, पर्याप्त नींद लेना, शारीरिक गतिविधियों में भाग लेना और वास्तविक जीवन में सामाजिक संपर्क बढ़ाना जरूरी है। सही दिशा और जागरूकता के साथ गेमिंग को मनोरंजन तक सीमित रखा जा सकता है, अन्यथा यह गंभीर समस्या का रूप ले सकती है। यदि किसी बच्चे या व्यक्ति में आत्मघाती विचार दिखाई दें, तो तुरंत पेशेवर मदद लें।
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