'20-30 करोड़ और मंत्री पद का दिया गया ऑफर'... उमर अब्दुल्ला का बड़ा राजनीतिक आरोप

Edited By Neetu Bala, Updated: 11 Jul, 2026 02:26 PM

offer of 20 30 crore and a ministerial post made

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने शनिवार को कहा कि जम्मू-कश्मीर के सब्र को कमजोरी नहीं समझना चाहिए।

श्रीनगर ( मीर आफताब )  :  मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने शनिवार को कहा कि जम्मू-कश्मीर के सब्र को कमजोरी नहीं समझना चाहिए। उन्होंने सवाल किया कि परिसीमन और विधानसभा चुनाव पूरे होने के बावजूद राज्य का दर्जा बहाल करने का वादा क्यों पूरा नहीं किया गया है। हजरतबल में बेगम अकबर जहान अब्दुल्ला की 26वीं पुण्यतिथि पर नेशनल कॉन्फ्रेंस के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए CM उमर ने कहा कि पार्टी 20 जुलाई को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन करेगी। उन्होंने कहा कि अब राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग को शांतिपूर्ण तरीके से तेज करने का समय आ गया है।

अपनी दादी बेगम अकबर जहान अब्दुल्ला को श्रद्धांजलि देते हुए उमर ने कहा कि वह जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक इतिहास के सबसे मुश्किल दौर में भी अडिग रहीं। राज्य का दर्जा बहाल करने में देरी पर सवाल उठाते हुए उमर ने कहा कि उन्होंने टकराव के बजाय बातचीत के जरिए मुद्दों को सुलझाने की कोशिश में लगभग दो साल बिताए हैं।

कड़ा आरोप लगाते हुए उमर ने आगे कहा कि पैसे और राजनीतिक पदों का लालच देकर नेशनल कॉन्फ्रेंस में दलबदल कराने की कोशिशें की जा रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया, "वे एक बार फिर नेशनल कॉन्फ्रेंस को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। मुझे बताया गया है कि जम्मू से हमारे एक MLA को 20-30 करोड़ रुपये, मंत्री पद और उनके साथ शामिल होने पर राज्य का दर्जा बहाल करने का वादा किया गया था। उन्हें लगता है कि लोगों की अंतरात्मा इतनी सस्ती है।"

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अनुच्छेद 370 पर सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही का जिक्र करते हुए उमर ने कहा कि केंद्र ने खुद तीन चरणों का रोडमैप तैयार किया था, जिसमें परिसीमन, चुनाव और राज्य का दर्जा बहाल करना शामिल था।

उन्होंने पूछा, "परिसीमन पूरा हो चुका है, चुनाव हो चुके हैं और लोगों ने हमें जनादेश दिया है। अब हमारी क्या गलती है? राज्य का दर्जा बहाल करने का वादा अभी भी क्यों लंबित है?"

मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि परिसीमन की प्रक्रिया राजनीतिक रूप से प्रेरित थी और इसका मकसद BJP को फायदा पहुंचाना था। उन्होंने कहा, "हमें पता था कि परिसीमन में हेरफेर की जाएगी। इसका मकसद एक राजनीतिक पार्टी का पक्ष लेना था। इसके बावजूद, जम्मू-कश्मीर की जनता ने अपना फैसला सुनाया और न केवल BJP बल्कि उसकी सभी सहयोगी पार्टियों को भी नकार दिया।"  “चुनाव नतीजों से मैं खुद हैरान था। लेकिन क्या लोगों की जीत को अब उनकी सज़ा माना जा रहा है?” उन्होंने पूछा।

चुनी हुई सरकार के कामकाज पर सवाल उठाते हुए उमर ने कहा कि अगर अहम फैसले राजभवन से ही लिए जाते रहे, तो चुनाव कराने का कोई खास मकसद नहीं रह जाता।

“अगर सब कुछ राजभवन से ही चलाना है, अगर कर्मचारियों को वहीं से बर्खास्त करना है और सारे बड़े फैसले वहीं लेने हैं, तो चुनाव क्यों कराए गए? हमें सरकार में क्यों लाया गया, जबकि हमारे हाथ पीछे बंधे हुए थे?” उन्होंने कहा।

“आज हमें, जानबूझकर या अनजाने में, यह बताया जा रहा है कि बिना विरोध के कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता। हम अपनी स्थिति की तुलना लद्दाख से करते हैं और सवाल पूछने पर मजबूर हो जाते हैं,” उन्होंने कहा।

लद्दाख से तुलना करते हुए उमर ने कहा कि जहां केंद्र इस केंद्र शासित प्रदेश के लिए संवैधानिक सुरक्षा उपायों पर चर्चा करने को तैयार है, वहीं जम्मू-कश्मीर राज्य का दर्जा बहाल होने का इंतजार कर रहा है।

“हमें बताया जाता है कि एक देश में एक ही व्यवस्था होनी चाहिए, फिर भी लद्दाख को संवैधानिक सुरक्षा उपाय दिए जा रहे हैं, जबकि जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा तक नहीं दिया जा रहा है,” उन्होंने कहा।

मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और अन्य वरिष्ठ केंद्रीय मंत्रियों के सामने लगातार यह मुद्दा उठाया है। “प्रधानमंत्री, अमित शाह या किसी भी वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री के साथ ऐसी एक भी बैठक नहीं हुई जिसमें मैंने राज्य का दर्जा बहाल करने का मुद्दा न उठाया हो। हर बार हमें यही कहा जाता है कि सही समय आने पर ऐसा होगा। मैं उनसे पूछता हूं कि आखिर वह सही समय कब आएगा,” उन्होंने कहा।

उमर ने बीजेपी को खुली चुनौती दी कि वह साफ तौर पर कहे कि जब तक जम्मू-कश्मीर में उसकी सरकार नहीं बन जाती, तब तक राज्य का दर्जा बहाल नहीं किया जाएगा।

उन्होंने कहा “अगर आपका यही रुख है, तो सार्वजनिक रूप से यह कहने की हिम्मत दिखाएं कि जब तक बीजेपी यहां सरकार नहीं बना लेती, तब तक राज्य का दर्जा बहाल नहीं किया जाएगा,”

उन्होंने यह भी याद दिलाया कि उन्होंने शेर-ए-कश्मीर शेख मोहम्मद अब्दुल्ला को जेल जाते देखा, 1984 में नेशनल कॉन्फ्रेंस को बंटते देखा, फिर भी कभी सब्र का रास्ता नहीं छोड़ा।

“उन्होंने हमें सबसे बड़ी सीख यह दी कि सब्र कमजोरी नहीं है। इसका मतलब यह नहीं है कि हम अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाना बंद कर देंगे। अगर कोई हमारे सब्र को कमजोरी समझता है, तो वह गलतफहमी में है। हमारा सब्र ही हमारी ताकत है और, ईश्वर ने चाहा तो, यही हमारी जीत का कारण बनेगा,” उन्होंने कहा।  उन्होंने आगे कहा, "हमारी मांग सीधी-सीधी है। जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल किया जाए। हमारा सब्र अभी भी बना हुआ है, लेकिन इसे कभी भी आत्मसमर्पण नहीं समझा जाना चाहिए।"

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