J&K: सफेद हाथी साबित हो रही करोड़ों की मशीनें, स्वास्थ्य सेवाएं वेंटिलेटर पर, पढ़ें...

Edited By Neetu Bala, Updated: 16 Apr, 2026 08:18 PM

j k multi crore machines proving to be white elephants

जम्मू-कश्मीर में स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल उलट नजर आती है।

जम्मू: जम्मू-कश्मीर में स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल उलट नजर आती है। विशेषकर ट्रॉमा केयर सैंटर (टी.सी.सी.), जिनका उद्देश्य सड़क दुर्घटनाओं और गंभीर हादसों में घायल लोगों की जान बचाना है, वे आज खुद बदहाली का शिकार हैं। करोड़ों रुपए खर्च कर बनाए गए ये केंद्र स्टाफ की भारी कमी के कारण या तो बंद पड़े हैं या फिर उनका उपयोग अन्य कार्यों में किया जा रहा है।
जम्मू-कश्मीर में सड़क दुर्घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। वर्ष 2020 के विभागीय आंकड़ों के अनुसार सड़क हादसों में 699 लोगों की मौत हुई और 5,951 लोग घायल हुए। उधमपुर और रामबन जैसे जिलों में ही 106 लोगों की जान चली गई और 725 लोग घायल हुए। सी.ए.जी. की ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2016-22 के दौरान यदि ट्रॉमा केयर सैंटर सही तरीके से काम कर रहे होते, तो ‘गोल्डन ऑवर’ में इलाज मिलने से इन मौतों में कमी लाई जा सकती थी।

आज भी स्टाफ की कमी निरंतर जारी है। हाल ही के विधानसभा बजट सत्र में विशेषज्ञों व पैरा मैडिकल स्टाफ की कमी का मुद्दा गर्माया था जिस पर स्वास्थ्य मंत्री सकीना इत्तू ने विश्वास दिलाया कि सरकार फास्ट ट्रैक पर खाली पदों को भरेगी ताकि स्वास्थ्य सेवाएं सुचारू रूप से जारी रहें। 

ऊधमपुर/रामबन में करोड़ों के ट्रॉमा सैंटर बेकार

जिला अस्पताल ऊधमपुर में फरवरी 2016 में लगभग 4.58 करोड़ की लागत से ट्रॉमा केयर सैंटर स्थापित किया गया था। इसका उद्देश्य गंभीर घायलों को ‘गोल्डन ऑवर’ के भीतर उपचार उपलब्ध कराना था, ताकि उनकी जान बचाई जा सके, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतने वर्षों बाद भी यह सैंटर पूरी तरह से चालू नहीं हो पाया है। इसकी सबसे बड़ी वजह डॉक्टरों और तकनीकी स्टाफ की कमी बताई जा रही है। जबकि इस सैंटर के लिए 34 पद स्वीकृत किए गए थे, लेकिन इन पदों पर नियुक्ति नहीं हो सकी। रामबन जिले में भी ट्रॉमा केयर सेंटर की स्थिति कुछ बेहतर नहीं है। यहां 35 पद स्वीकृत किए गए थे, लेकिन नवम्बर 2023 तक केवल 8 विशेषज्ञ डॉक्टर ही तैनात थे। स्थिति इतनी खराब है कि ट्रॉमा सेंटर को मातृत्व वार्ड, डायलिसिस यूनिट, ऑप्रेशन थिएटर और अन्य सेवाओं के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। परिणामस्वरूप करोड़ों की लागत से बने यह केंद्र केवल एक शोपीस बनकर रह गया है और आम जनता को इसका कोई लाभ नहीं मिल रहा।

पी.एच.सी./एस.सी. में भी भारी संकट

ट्रॉमा सैंटर ही नहीं, बल्कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पी.एच.सी.) की स्थिति भी चिंताजनक है। जम्मू-कश्मीर के 975 पी.एच.सी. में से 301 पी.एच.सी. में डॉक्टर नहीं हैं। इसके अलावा 669 पी.एच.सी. में नर्स नहीं हैं और 149 पी.एच.सी. में पैरामेडिकल स्टाफ नहीं है। 351 पी.एच.सी. में सहायक स्टाफ नहीं है। स्वास्थ्य सेवाओं की नींव माने जाने वाले सब-सैंटरों में भी हालात खराब है। आई.पी.एच.एस. मानकों के अनुसार हर सब-सैंटर में एक महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता और एक पुरुष स्वास्थ्य कार्यकर्ता होना चाहिए। लेकिन कई केंद्रों पर दोनों ही पद खाली हैं, जिससे बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं भी प्रभावित हो रही हैं। सरकार द्वारा करोड़ों रुपए खर्च कर स्वास्थ्य भवन तो बनाए जा रहे हैं, लेकिन उनमें जरूरी स्टाफ की नियुक्ति नहीं की जा रही। उदाहरण के तौर पर पी.एच.सी. अलिनबास का भवन 2015 में 232.80 लाख की लागत से तैयार हुआ, लेकिन वहां मार्च 2022 तक कोई स्थायी स्टाफ तैनात नहीं किया गया।

जिलों में असमान स्टाफ वितरण

जम्मू-कश्मीर के विभिन्न जिलों में स्टाफ की उपलब्धता में भारी असमानता है। कहीं स्टाफ की कमी 11 प्रतिशत है, तो कहीं यह 43 प्रतिशत से अधिक है। डॉक्टरों की कमी कई जिलों में 40 प्रतिशत से ज्यादा है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मार्च 2022 तक 3,292 कर्मचारियों को आऊटसोर्स किया गया। इनमें सुरक्षा कर्मी, सफाई कर्मचारी, डाटा एंट्री ऑप्रेटर, ड्राइवर, अटैंडैंट और अन्य अस्थायी कर्मचारी शामिल हैं। स्टाफ की सबसे कम कमी कुलगाम (11.52 प्रतिशत) में दर्ज की गई जबकि सबसे ज्यादा कमी किश्तवाड़ (43.55 प्रतिशत) में पाई गई।

डॉक्टरों की भारी कमी, हर जिले में खाली पद

जम्मू कश्मीर के अस्पतालों व अन्य स्वास्थ्य केंद्रों में सबसे गंभीर स्थिति डॉक्टरों की है। सभी जिलों में डॉक्टरों के पद खाली पाए गए हैं। वर्ष 2022 तक 9 जिलों में यह कमी 40 प्रतिशत से अधिक है। यह स्थिति सीधे तौर पर मरीजों के इलाज को प्रभावित करती है, क्योंकि बिना डॉक्टरों के स्वास्थ्य केंद्र केवल इमारत बनकर रह जाते हैं। नर्सिंग स्टाफ की कमी भी चिंताजनक है। 4 जिलों में नर्सों की कमी 40 प्रतिशत से अधिक है। नर्सों की कमी का असर मरीजों की देखभाल और अस्पतालों के संचालन पर पड़ता है। पैरामैडिकल और अन्य स्टाफ की भी कमी पाई गई है। पैरामैडिकल स्टाफ में रियासी (43.03 प्रतिशत) में सबसे ज्यादा कमी पाई गई जबकि सबसे कम कमी उधमपुर (14 प्रतिशत) में पाई गई। यह खुलासा सी.ए.जी. की रिपोर्ट में हुआ है। आंकड़ों में थोड़ा बहुत सुधार भी दिख रहा है, लेकिन सी.ए.जी. के अनुसार हकीकत यह है कि स्वास्थ्य विभाग अब भी गंभीर स्टाफ संकट से जूझ रहा है। अगर समय रहते स्थायी समाधान नहीं किया गया, तो स्वास्थ्य सेवाएं और बदतर हो सकती हैं, जिससे आम लोगों की जिंदगी पर सीधा खतरा बना रहेगा।

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