Jammu Kashmir की नदियां संकट में, Experts ने दी चेतावनी

Edited By Sunita sarangal, Updated: 24 Jun, 2026 01:10 PM

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जम्मू-कश्मीर की अनेक प्रमुख नदियां और जल निकाय आज गंभीर प्रदूषण की चपेट में हैं।

जम्मू(सतीश): किसी भी सभ्यता का इतिहास उठाकर देख लीजिए हर महान संस्कृति, हर समृद्ध नगर व हर विकसित समाज की नींव किसी न किसी नदी के किनारे ही रखी गई थी। नदियां केवल जलधाराएं नहीं होती, वे जीवन, संस्कृति, आस्था और अस्तित्व की प्रतीक होती हैं। वे खेतों को हरियाली देती हैं, प्यास बुझाती हैं, जीव-जंतुओं को आश्रय देती हैं और समाज को जीवंत बनाए रखती हैं, लेकिन पर्यावरणविदों के अनुसार आज जम्मू-कश्मीर की अनेक नदियां, जो कभी इस धरती की पहचान हुआ करती थीं, मानव लापरवाही और प्रशासनिक उदासीनता के कारण धीरे-धीरे मौत की ओर बढ़ रही हैं। औद्योगिक कचरा, जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट, बिना उपचार का सीवरेज, ठोस कचरे का अंधाधुंध निस्तारण और नदी तटों पर बढ़ते अतिक्रमण ने इन जीवनदायिनी नदियों को प्रदूषण की नालियों में बदल दिया है।

गंभीर प्रदूषण की चपेट में अनेक प्रमुख नदियां और जल निकाय

जम्मू-कश्मीर की अनेक प्रमुख नदियां और जल निकाय आज गंभीर प्रदूषण की चपेट में हैं। तवी, झेलम, देविका, बसंतर, विशाव, पुंछ और रम्बी आरा जैसी नदियां आज प्रदूषण, उपेक्षा और प्रशासनिक विफलता की शिकार हैं। विडंबना यह है कि हर वर्ष पर्यावरण संरक्षण के दावे किए जाते हैं, करोड़ों रुपए की योजनाओं की घोषणाएं होती हैं और स्वच्छता के अभियान चलाए जाते हैं, लेकिन जमीन पर नदियों में गिरता गंदा पानी, कचरे के ढेर और जहरीले अपशिष्ट इन दावों की वास्तविकता उजागर कर देते हैं। जम्मू शहर की तवी नदी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। लगभग 19 नालों का बिना उपचार किया गया, सीवरेज प्रतिदिन नदी में गिरता है। प्रशासन को इसकी जानकारी है, प्रदूषण नियंत्रण एजैंसियां भी इससे अनजान नहीं हैं, फिर भी स्थिति जस की तस बनी हुई हैं। ऐसा लगता है कि मानो नदी को बचाने की नहीं, उसके धीरे-धीरे खत्म करने की प्रतिक्षा की जा रही हो।

क्या हैं प्रदूषण के मुख्य कारण

जम्मू-कश्मीर की नदियों का यह विनाश प्राकृतिक नहीं है। यह पूरी तरह मानव निर्मित है और इसे रोका जा सकता है। जम्मू शहर के लगभग 19 नालों का बिना किसी उपचार के सीधे तवी नदी में गिरता है। नदियों में औद्योगिक और जैव-चिकित्सीय कचरे का नदियों में निस्तारण होता है। नगर निकायों द्वारा नदी किनारों और शहरों के बाहरी क्षेत्रों में ठोस कचरे का ढेर लगाना और उद्योगों द्वारा पर्यावरणीय मानकों की अवहेलना करते हुए अपशिष्ट छोड़ना, निर्माण कार्यों से निकलने वाला मलबा और शहरी बहाव एवं नदी तटों पर बढ़ते अतिक्रमण और अवैध निर्माण नदियों के विनाश का कारण हैं।

इन कारणों का परिणाम यह है कि कई स्थानों पर नदी का पानी पीने, नहाने, सिंचाई करने और अन्य सामान्य उपयोगों के लिए भी अनुपयुक्त होता जा रहा है। इस पूरे संकट का सबसे पीड़ादायक और विडंबनापूर्ण दृश्य तवी आरती के दौरान देखने को मिलता है, जब एक ओर नदी को पवित्र मानकर उसकी पूजा करते हैं, दूसरी ओर उसी नदी को प्रदूषण से भर देते हैं।

केवल बातें नहीं, ठोस कार्रवाई चाहिए : पर्यावरणविद

‘वी द ह्यूमन फोरम फॉर नेचर एण्ड मैनकाइंड’ के चेयरमैन व पर्यावरण विद अनुज वर्मा ने कहा कि जम्मू-कश्मीर की नदियों को बचाने के लिए घोषणाओं और आश्वासनों से आगे बढ़ना होगा। सरकार, प्रशासन, उद्योगों और नागरिक समाज को मिलकर एक व्यापक अभियान चलाना होगा। सरकार को चाहिए कि सभी प्रमुख नालों के लिए आधुनिक और पूर्णत: कार्यशील सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित किए जाएं। किसी भी नाले को बिना उपचारित पानी नदी में छोड़ने की अनुमति न दी जाए। औद्योगिक और जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट के अवैध निस्तारण पर शून्य-सहनशीलता नीति लागू की जाए। नदी किनारों पर ठोस कचरा फैंकने की प्रथा को तत्काल रोका जाए।

नदी पुनर्जीवन मिशनों को समयबद्ध और परिणामोन्मुख बनाया जाए। उल्लंघन करने वाले उद्योगों, अस्पतालों और सरकारी एजेंसियों पर कठोर आर्थिक दंड लगाया जाए। नदी तटों से अतिक्रमण हटाकर उनके प्राकृतिक प्रवाह को पुनस्र्थापित किया जाए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एन.जी.टी.) व जम्मू-कश्मीर प्रदूषण नियंत्रण समिति (जे.एण्ड के.पी.सी.बी.) को केवल निगरानी संस्थाओं तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि उन्हें ऐसे प्रभावी और कठोर प्रवर्तन अधिकार दिए जाने चाहिए जो प्रदूषण फैलाने वालों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित कर सकें।

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