Edited By Neetu Bala, Updated: 16 Apr, 2026 04:26 PM

कोर्ट ने साफ किया कि जांच एजेंसी को कानून के मुताबिक जांच जारी रखने की पूरी आज़ादी है, बशर्ते वह आपराधिक कानून के तहत मान्यता प्राप्त सभी जायज, गैर-दखलंदाजी वाले और संवैधानिक रूप से सही तरीकों को अपनाए।
श्रीनगर ( मीर आफताब ) : 1990 के सरला भट हत्याकांड में, श्रीनगर में NIA एक्ट के तहत नामित एडिशनल सेशंस जज, TADA/POTA स्पेशल जज की अदालत ने स्टेट इन्वेस्टिगेटिंग एजेंसी (SIA) की उस अर्जी को खारिज कर दिया है, जिसमें संदिग्धों का नार्को एनालिसिस, ब्रेन मैपिंग और डिसेप्शन डिटेक्शन टेस्ट कराने की इजाजत मांगी गई थी। अदालत ने कहा कि दशकों पुरानी जांच में रह गई कमियों को भरने के लिए पुलिस के कहने पर ऐसे दखल देने वाले तरीके अपनाने की इजाजत नहीं दी जा सकती।
यह अर्जी SIA कश्मीर के चीफ इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर, डिप्टी सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस ने SIA कश्मीर के CPO हिलाल अहमद भट के जरिए दायर की थी। यह मामला पुलिस स्टेशन नगीन के FIR नंबर 56/1990 से जुड़ा है, जिसकी जांच अब SIA कश्मीर कर रही है। यह FIR अप्रैल 1990 में सरला भट की हत्या के संबंध में दर्ज की गई थी।
एजेंसी ने दावा किया कि संदिग्ध सहयोग नहीं कर रहे हैं और सच जानने, असली दोषियों की पहचान करने, मकसद का पता लगाने और ज़रूरी सबूत बरामद करने के लिए वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल ज़रूरी है। हालांकि, संदिग्धों ने इस अर्जी का विरोध करते हुए दलील दी कि यह अर्जी लगभग 35 से 36 साल की बिना किसी वजह के हुई देरी के बाद दायर की गई है और जांच में हुई गलतियों की भरपाई करने के लिए उन्हें ऐसे दखल देने वाले तरीकों से गुजरने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि उनमें से कई लोग अब काफी बुज़ुर्ग हो चुके हैं और दिल की बीमारी, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और न्यूरोलॉजिकल समस्याओं जैसी गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं। ऐसे में ये टेस्ट करवाना उनके लिए खतरनाक हो सकता है और यह उनके जीने के अधिकार, गरिमा और शारीरिक अखंडता के अधिकार का उल्लंघन होगा।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए कानून से यह साफ है कि बिना मर्ज़ी के या पुलिस के दबाव में नार्को एनालिसिस और उससे जुड़े वैज्ञानिक टेस्ट करवाना गलत है और यह संविधान के अनुच्छेद 20(3) और 21 के तहत मिले संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। अदालत ने फैसला सुनाया कि ऐसे तरीकों को जांच के लिए कोई आसान रास्ता (शॉर्टकट) मानकर या संदिग्धों द्वारा कथित तौर पर सहयोग न करने की समस्या से निपटने के लिए इस्तेमाल करने की इजाज़त नहीं दी जा सकती।
अदालत ने आगे कहा कि यह अर्जी किसी ऐसे आरोपी की तरफ से नहीं आई थी जो कानूनी प्रक्रिया के सही चरण पर अपनी मर्ज़ी से ऐसे टेस्ट करवाने के लिए तैयार हो, बल्कि यह अर्जी खुद जांच एजेंसी ने दायर की थी। इसका मकसद उस जांच को फिर से शुरू करना या मजबूत करना था जो तीन दशकों से भी ज़्यादा समय से किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाई थी। अदालत ने कहा कि जांच के इतने देर से आए चरण पर, ऐसे टेस्ट से मिलने वाले किसी भी सुराग की सच्चाई की जांच करना या उनकी पुष्टि करना बेहद मुश्किल होगा। असाधारण देरी और कई संदिग्धों की मेडिकल हालत को गंभीरता से लेते हुए, कोर्ट ने कहा कि जांच की सुविधा मौलिक अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकती। कोर्ट ने माना कि इस मामले में नार्को एनालिसिस, ब्रेन मैपिंग या झूठ पकड़ने वाले टेस्ट की इजाज़त देने का कोई कानूनी आधार या कोई बहुत जरूरी जरूरत नहीं थी, और इसलिए SIA की अर्ज़ी खारिज कर दी।
साथ ही, कोर्ट ने साफ किया कि जांच एजेंसी को कानून के मुताबिक जांच जारी रखने की पूरी आज़ादी है, बशर्ते वह आपराधिक कानून के तहत मान्यता प्राप्त सभी जायज, गैर-दखलंदाजी वाले और संवैधानिक रूप से सही तरीकों को अपनाए।
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