Edited By Neetu Bala, Updated: 13 Jul, 2026 04:05 PM
नदी से पानी लाना ही वर्तमान में सबसे व्यवहारिक विकल्प दिखाई दे रहा है। इसके लिए DPR तैयार कर उच्च अधिकारियों को भेजी जाएगी।
श्रीनगर : उत्तरी कश्मीर में नियंत्रण रेखा के साथ सटे उड़ी सैक्टर में सलामाबाद स्थित जैतून बाग को फिर से जीवंत बनाने के लिए बागवानी विभाग ने अब झेलम नदी का पानी इस्तेमाल करने का फैसला किया है। बाग तक पानी पहुंचाने के लिए लिफ्ट इरिगेशन योजना पर काम हो रहा है। इसके लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डी.पी.आर.) तैयार की जाएगी। वर्षों से भरोसेमंद सिंचाई व्यवस्था के अभाव में इस ऐतिहासिक बाग की उत्पादकता लगातार घटती जा रही है। लगभग 29 कनाल क्षेत्र में फैला यह जैतून बाग वर्ष 1987 में भारत-इटली सहयोग के तहत स्थापित किया गया था। कभी इस परियोजना को कश्मीर में जैतून की खेती की नई संभावनाओं के रूप में देखा गया था, लेकिन वर्ष 2005 में आए विनाशकारी भूकंप के बाद इसकी जल आपूर्ति व्यवस्था क्षतिग्रस्त हो गई। इसके बाद से बाग पूरी तरह बारिश के पानी पर निर्भर हो गया।
बागवानी विभाग के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि क्षेत्र में कोई स्थायी सिंचाई सुविधा नहीं है। झेलम नदी से पानी लाना ही वर्तमान में सबसे व्यवहारिक विकल्प दिखाई दे रहा है। इसके लिए DPR तैयार कर उच्च अधिकारियों को भेजी जाएगी।
अधिकारियों का कहना है कि सिंचाई की कमी ने जैतून के पेड़ों की वृद्धि और उत्पादन क्षमता को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। 2005 के भूकंप से पहले एक प्राकृतिक जलधारा से पानी मिलता था, जिसे टैंक में जमा कर बाग की सिंचाई के लिए इस्तेमाल किया जाता था।

ऊंचाई के कारण बोरवेल योजना भी तकनीकी रूप से हुई असफल
सिंचाई संकट को देखते हुए विभाग ने अन्य विकल्पों पर भी विचार किया। वर्ष 2024 में सिंचाई विभाग ने भूजल स्रोत विकसित करने की संभावना का आकलन किया था, लेकिन क्षेत्र की अधिक ऊंचाई के कारण बोरवेल योजना तकनीकी रूप से सफल नहीं हो सकी। एक अधिकारी ने बताया कि क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति के कारण भूजल निकालना आसान नहीं है, इसलिए नदी से पानी लाने का विकल्प अधिक उपयुक्त है।
बागवानी विभाग के एक अधिकारी के अनुसार, उड़ी की अनोखी सूक्ष्म जलवायु (माइक्रोक्लाइमेट), जहां सर्दियां अपेक्षाकृत गर्म रहती हैं, तापमान आमतौर पर -5 डिग्री सैल्सियस से नीचे नहीं जाता, बर्फबारी बहुत कम होती है और ढलान वाली जमीन में जल निकासी अच्छी होती है, यह सब भूमध्यसागरीय क्षेत्रों के जैतून के बागों जैसी परिस्थितियां प्रदान करता है।

चार दशक पुरानी परियोजना, बड़ी उम्मीदें
सलामाबाद का जैतून बाग लगभग चार दशक पहले बड़ी उम्मीदों के साथ स्थापित किया गया था। यह बाग एक हैक्टेयर के करीब क्षेत्र में फैला है और यहां 232 जैतून के पेड़ हैं। इनसे छह से सात किस्मों के जैतून का उत्पादन किया जाता है। भारत-इटली परियोजना के तहत इटली की कई उन्नत किस्में ‘पेंडोलिनो, लेचिनो, फ्रैंटोयो, कोराटिना, मोरोलिना और सिप्रेसिनो’ यहां लाई गई थीं।
बागवानी अधिकारियों के अनुसार, उड़ी क्षेत्र में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले जंगली जैतून, जिसे स्थानीय रूप से ‘कोह’ कहा जाता है, की मौजूदगी ने भी इस फसल की सफलता की उम्मीद बढ़ाई थी। एक अधिकारी ने कहा कि इस बाग को प्रदर्शन इकाई के रूप में विकसित किया गया था, ताकि स्थानीय किसानों को दिखाया जा सके कि उड़ी में जैतून की खेती संभव है।
उत्पादन में गिरावट की वजह वैज्ञानिक प्रबंधन की कमी
जैतून के पेड़ों ने वर्ष 1996 से फल देना शुरू किया था, लेकिन समय के साथ उत्पादन स्थिर नहीं रह सका। अधिकारियों और कर्मचारियों के अनुसार, इसके पीछे वैज्ञानिक प्रबंधन की कमी प्रमुख कारण रही। नियमित छंटाई न होने से पेड़ों की शाखाएं घनी हो गईं, जिससे सूर्य का प्रकाश कम पहुंचा और फूल आने तथा फल विकसित होने की प्रक्रिया प्रभावित हुई। एक स्थानीय माली ने कहा कि पेड़ों की सही तरीके से छंटाई नहीं हुई।
शाखाएं आपस में उलझ गईं और धीरे-धीरे फल उत्पादन कम होता गया। इसके अलावा मिट्टी प्रबंधन और पोषक तत्वों की कमी ने भी बाग को प्रभावित किया। कर्मचारियों के अनुसार, स्थानीय मिट्टी की जरूरतों के अनुसार कोई नियमित उर्वरक योजना लागू नहीं की गई। इन समस्याओं को देखते हुए बागवानी विभाग ने अब जैतून बाग के पुनर्जीवन की योजना शुरू की है। इसमें पुनर्जीवन छंटाई, सिंचाई व्यवस्था का विकास और वैज्ञानिक निगरानी शामिल है। इस काम में सकासट कश्मीर के विशेषज्ञों की तकनीकी सहायता ली जा रही है। मिट्टी, पत्तियों और फलों के नमूने भी प्रयोगशाला जांच के लिए एकत्र किए गए हैं।
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